तुम्हें भुलाना भी चा…

तुम्हें भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
के तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं

वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए

(रब्त = संबंध, मेल)

दिल आखिर तू क्यूँ रोता है

जब जब दर्द का बादल छाया
जब ग़म का साया लहराया
जब आंसू पलकों तक आया
जब यह तनहा दिल घबराया
हमने दिल को यह समझाया
दिल आखिर तू क्यूँ रोता है
दुनिया में यूँही होता है
यह जो गहरे सन्नाटे हैं
वक़्त ने सबको ही बांटे हैं
थोडा ग़म है सबका किस्सा
थोड़ी धूप है सबका हिस्सा
आँख तेरी बेकार ही नम हैं
हर पल एक नया मौसम है
क्यूँ तू ऐसे पल खोता है
दिल आखिर तू क्यूँ रोता है