उम्र के कागज़ पर तेर…

उम्र के कागज़ पर
तेरे इश्क ने अंगूठा लगाया
हिसाब कौन चुकायेगा!

किस्मत ने एक नगमा लिखा है
कहते हैं कोई आज रात
वही नगमा गायेगा

हवा की आहें आज कौन सुने,
चलूॅं, आज मुझे
तकदीर बुलाने आई है…
उठूॅं, चलूॅं, तकदीर मुझे बुलाने आई है

भारतीय मर्द अब भी और…

भारतीय मर्द अब भी औरतों को
परंपरागत काम करते देखने के
आदि हैं…
उन्हें बुध्दिमान औरतों की संगति
तो चाहिए होती है लेकिन शादी
के लिए नहीं,
एक सशक्त महिला के साथकी कद्र
करना अब भी उन्हें नहीं आया है!

वह कहता था, वह सुनत…

वह कहता था,
वह सुनती थी,
जारी था एक खेल
कहने-सुनने का।

खेल में थी दो पर्चियाँ।
एक में लिखा था ‘कहो’,
एक में लिखा था ‘सुनो’

अब यह नियति थी
या महज़ संयोग?
उसके हाथ लगती रही वही पर्ची
जिस पर लिखा था ‘सुनो’

वह सुनती रही।
उसने सुने आदेश।
उसने सुने उपदेश।
बन्दिशें उसके लिए थीं।
उसके लिए थीं वर्जनाएँ।

वह जानती थी,
‘कहना-सुनना’
नहीं हैं केवल क्रियाएं।

राजा ने कहा, ‘ज़हर पियो’
वह मीरा हो गई।

ऋषि ने कहा, ‘पत्थर बनो’
वह अहिल्या हो गई।

प्रभु ने कहा, ‘निकल जाओ’
वह सीता हो गई।

चिता से निकली चीख,
किन्हीं कानों ने नहीं सुनी।
वह सती हो गई।

तीन बार तलाक कहा तो परित्यक्ता हो गयी

घुटती रही उसकी फरियाद,
अटके रहे शब्द,
सिले रहे होंठ,
रुन्धा रहा गला।

उसके हाथ कभी नहीं लगी वह पर्ची,
जिस पर लिखा था, ‘कहो’

रिश्ते पुराने होते ह…

रिश्ते पुराने होते हैं
पर मायका पुराना नही होता..

जब भी जाओ..
अलायें बलायें टल जाये
यह दुआयें मांगी जाती हैं..
यहां वहां बचपन के कतरे बिखरे होते है..
कही हंसी, कही खुशी ,कही आंसू सिमटे होते हैं..

बचपन की गिलास, कटोरी
खाने का स्वाद बढ़ा देते हैं..
अलबम की तस्वीरें
कई किस्से याद दिला देते हैं..

सामान कितना भी समेटूं
कुछ ना कुछ छूट जाता है
सब ध्यान से रख लेना
हिदायत पापा की.. कैसे कहूं सामान तो नही
पर दिल का एक हिस्सा यही छूट जाता है..
आते वक्त माँ आँचल मेवे से भर देती हैं
खुश रहना, कह कर अपने आँचल मे भर लेती है..

आ जाती हूं मुस्करा कर मैं भी,
कुछ ना कुछ छोड़ कर अपना..

रिश्ते पुराने होते हैं ,
जाने क्योँ मायका पुराना नही होता..?

उस देहरी को छोड़ना हर बार..
आसान नही होता..